चुनौती देता कोरोना और हमारी लापरवाही - Nai Ummid
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चुनौती देता कोरोना और हमारी लापरवाही


नेपाल में कोरोना संक्रमण के कारण लाॅकडाॅन के लगभग 5 महीने पूरे हो गए हैं और हम छठें महीने में प्रवेश करने के कगार पर हैं। इन 5 महीनों में कोराना संक्रमण का संकट कम होने के बजाय बढ़ता ही गया। कोरोना संक्रमण के इस फैलाव का ठीकरा क्या हमारी लापरवाही और बदइंतजामी पर मढ़ा जा सकता है। आइए इन सवालांे को जवाब ढूंढने का प्रयास करते हैं। 

इन सवालों का जवाब ढूंढ़े उससे पहले एक बात तो स्पष्ट हो गया है कि केवल नेपाल ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया कोरोना के फैलाव को रोकने में नाकाम साबित हुयी है और इसके टीेके को लेकर लगातार नये-नये दावे किए जा रहे हैं लेकिन अब तक किसी भी टीका को सर्व मान्यता नहीं मिल पायी है। 

नेपाल में संघ, प्रदेश और स्थानीय यानि तीन स्तर की सरकार है। किसी भी व्यवस्था, सरकार, नेता या जनप्रतिनिधि या नागरिक की क्षमता असहज परिस्थिति में ही मूल्यांकन किया जाता है। यही जांच करने कोरोना विश्व भर में पहुंच चुका है और त्राहिमाम कर रहा है।

जनता/नागरिक

कोरोना संक्रमण के नेपाल पहुंचने पर लाॅकडाॅन की शुरुआत हुयी। इसके फैलाव को रोकने में नागरिक की भूमिका सबसे अहम है। डब्ल्यूएचओ के गाइडलाइन के अनुसार नेपाल सरकार ने भी अपनी जनता को कोरोना महामारी से बचाने के लिए कानून बनाये और दिशा-निर्देश दिए। प्रचार-प्रसार भी अनेक माध्यमों से किया गया। कुछ लोगों ने इसे गंभीरता से लिया तो कुछ ने इसे हल्के में लिया। नतीजा सामने है। स्थिति नियंत्रण होने के बजाय अनियंत्रित ही होता चला गया। इस बीच हमारी मानसिकता कुछ ऐसी रही - उस प्रदेश में कोरोना संक्रमित ज्यादा है मेरे यहां नहीं, उस जिले में ज्यादा संक्रमित हैं तो मेरे जिले में कम है। अरे कुछ नहीं होगा। हमलोग सुरक्षित हैं। मेरे गाउंपालिका या नगरपालिका में कम है जबकि दूसरे नगरपालिका/गाउंपालिका में ज्यादा है, उसके वार्ड में अधिक कोरोना संक्रमित है मेरे वार्ड में कम है। ऐसा कह-कहके हम अपने आपको, परिवार, दोस्तों, समुदायों को दिलासा देते रहे जिसके कारण कोरोना संक्रमण के फैलाव को रोकने वाले दिशा-निर्देंशों की धज्जियां उड़ती रही। नतीजा हम सबके सामने है कि इस बीच कोरोना अपना पैर फैलाता रहा। 

इसका एक दूसरा पहलू भी है। लाॅकडाॅन की अवधि होने के कारण सारे काम-धंधे, व्यापर चैपट होते चले गए जिसका नतीजा रहा लोगों की आमदनी ठप्प होना। और लोग धीरे-धीरे भूखमरी के करीब आने लगे। ऐसे हालात में सरकार ने जनता की भावनाओं पर मरहम लगाते हुए राहत वितरण कार्य किया। लेकिन यह राहत वितरण छः महीने के लाॅकडाॅन में ऊंट के मूंह में जीरा के बराबर रहा। अंत में जनता करे तो क्या करें। वो भी कई बार सार्वजनिक रूप से या फिर फिर चोरी-छूपे अपने-अपने कामों पर लग गयी। ताकि कम से कम भूखमरी जैसी समस्याओं से निपटा जा सके। ऐसे में प्रशासन भी मूक-दर्शक बनी रही। प्रशासन एकाध दिन डंडों का इस्तेमाल कर कड़ाई से लाॅकडाॅन पालन करवाती फिर उसके बाद वही हाल ए बेहाल। लेकिन सबसे बड़ी चूक रही कि जनता ने सोशल डिस्टेंसिंग एवं मास्क जैसे नियमों को सख्ती से अपने ऊपर लागू नहीं किया। यदि ऐसा होता तो हालात कुछ और ही होते। अब बात कर लेते हैं व्यवस्थापन की।

व्यवस्थापन

कोरोना संक्रमण और इसके व्यवस्थापन पर लगातार प्रश्नचिहन खड़े होते रहे हैं जैसे कि संक्रमितों का इन्वेस्टिगेशन कैसे होगा? अस्पताल के पीड़ितों का परीक्षण फिजिशियन करेगा या कोई और? कोरोना संक्रमित अपनी यात्रा विवरण सहित पूर्ण विवरण सही तरीका और सत्य बताते कि नहीं, सत्य जानकारी लेने के लिए भी सक्षम जनशक्ति है या नहीं, आदि-आदि सवाल। 

इन सवालों का उत्तर ढूंढकर कार्यान्वयन की जरूरत है। वैसे इस बारे में आखिर क्या हो रहा है हमारे यहां। समाज में यदि किसी परिवार के एक सदस्य का कोरोना जांच में रिपोर्ट नेगेटिव आता है तो सारा परिवार और समुदाय रिलैक्स हो जाता है। लेकिन कुछ दिन बाद पता चलता है कि उसी परिवार के उसी सदस्य को बुखार और सर्दी-खांसी है। फिर उसकी जांच होती है और पता चलता है वह कोरोना पाॅजीटिव है। तब तक कई लोगों को कोरोना अपने गिरफ्त में ले लेता। फिर क्या, हाॅस्पिटल में बेड भर जाने के कारण उसे घर में ही होम क्वारेंटाइन या आइसोलेट किया जाता है। और जब हाॅस्पिटल में बेड खाली होता है तो उसे अस्पताल में दाखिल कराया जाता है। इस व्यवस्था में रिस्क अपने उच्चतम स्तर पर होता है जिससे कोरोना संक्रमण समुदाय स्तर पर फैलने लगता है। 

इस व्यवस्था में सुधार लाने की आवश्यकता है। सभी संक्रमितों को अस्पताल ले जाना जरूरी होता है। लक्षण न दिखने पर या कुछ सामान्य लक्षण दिखने पर लेवल 2 और 3 के अस्पताल में लाना चाहिए लेकिन घर के आइसोलेसन में उसे रखना खतरे से खाली नहीं। क्योंकि हम अपने घरों में कोरोना संक्रमण को लेकर उच्च सतर्कता नहीं अपनाते। चाहे कितना भी प्रयास कर लें कोई न कोई चूक की गुंजाईश हमेशा बनी रहती है। 

अनुसन्धानकर्ता में ‘कम्युनिकेशन स्किल’ होना जरूरी है। उसे संक्रमितों का विश्वास जीतकर आचारसंहिता पालन करते हुए पूर्ण और सत्य जानकारी लेकर सम्बन्धित निकाय को रिपोर्ट करना ही काफी नहीं है बल्कि इसका कार्यान्वयन करना और सभी सरोकारवालों को जानकारी कराकर कार्यान्वयन हुआ या नहीं उसका अनुगमन भी करना जरूरी है।

जब कोरोना संक्रमित अस्पताल या क्वारेंटाइन में होता है तो सबसे पहले आता है भोजन और दिशा-निर्देश। अस्पताल में कोरोना संक्रमितों के खाने की अवस्था क्या है, इस बारे में संबंधित सरोकारवालों को ईमानदारीपूर्वक देखने की आवश्यकता है। आइसोलेसन में रह रहे प्रत्येक संक्रमितों को प्रत्येक दिन कम से कम दिन में तीन बार (सुबह, दोपहर और शाम) खाना मिल रहा है या नहीं और वो खाना गुणस्तरीय है या नहीं? अनुगमन करना जरूरी है वो भी ईमानदारीपूर्वक। 

कोभिड-19 संक्रमितों को आइसोलेसन सम्बन्धी स्वास्थ्य मापदण्ड, 2077 द्वारा तय निर्देशनों का पालन हो रहा है या नहीं? सरकार और इसके सरोकारवालों को स्पष्ट होना जरूरी है। 

कोरोना संक्रमितांे के सम्पर्क में आए व्यक्तियों की पहचान और जनस्वास्थ्य के विधियों को प्रभावकारी रूप में कार्यान्वयन बिना यह लड़ाई जीतना असम्भव है। कई जगहों पर देखा गया है कि वह व्यक्ति संक्रमण का स्रोत पता लगने के बाद भी खुलेआम घूम रहा है और समुदाय में संक्रमण फैलने में मदद कर रहा है।

सरकार

इन सबों में सरकार की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है जो न केवल नीतिनिर्माता है बल्कि कार्यान्वयनकर्ता भी है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि कोरोना संक्रमण काल में भी सरकार पर भ्रष्टाचार के जबरदस्त आरोप लगते रहे चाहे वो केंद्र सरकार हो या फिर प्रदेश सरकार या फिर स्थानीय सरकार। पारदर्शिता की कमी भी साफ-साफ नजर आयी। कोरोना व्यवस्थापकों पर लगातार आरोप लगता रहा कि कम दामों पर उपलब्ध होने वाली वस्तुओं को अधिकतम दामों पर खरीदा गया। यानि कोरोना के नाम पर खुलकर भ्रष्टाचार किया जाता रहा। 

अभी भी समय है जागिए, कार्ययोजना बनाइए और उसे  ईमानदारीपूर्वक लागू कीजिए। स्मरण रहें कि लोग जीवित रहेंगे तभी वह आपके वोटर, ग्राहक या सेवाग्राही बन सकते हैं। 

महत्वपूर्ण पदों पर आसीन एवं उनके परिवार और सरकारी निकायों में कार्यरत लोगों का संकलन किए गए नमूना का रिपोर्ट कितने दिनों में आता है और आम नागरिक का रिपोर्ट कितने दिन में, यह भी लोगों के जेहन में है। क्वारेंटाइन में रह रहे लोगों का रिपोर्ट देरी से आने पर और भी वो मानसिक रूप से टूटते चले जाते हैं। ऐसे अधिकतर लोग पहले से ही मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और रिपोर्ट में देरी इन्हें और झकझोर देता है। इसलिए समय पर स्वाब का रिपोर्ट देने की व्यवस्था को भी दुरूस्त करने की आवश्यकता है। 

संघ, प्रदेश, स्थानीय, वार्ड, गांव, टोल और घर को कैसे अधिक से अधिक अच्छा बना सकते हैं और इन सबके बीच कैसे अधिकतम सहकार्य कर अच्छा किया जा सकता है, इस पर ध्यान देना जरूरी है। 

निष्कर्ष

ईमानदारी के साथ यह काम करना और सम्पर्क में आए व्यक्तियों का पहचान कर उनलोगों को स्थानीय क्वारेन्टाइन या होम क्वारेन्टाइन में रखने की व्यवस्था को दुरूस्त करना होगा।


कोरोना से लड़ने के लिए सावधानी, सुरक्षा और जनस्वास्थ्य के नियमों का पालन करना ही बेहतर विकल्प है। साथ ही प्रत्येक नागरिक को स्वयं जिम्मेवार होना नितांत जरूरत है। 


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