क्या बिहार की रैलियों में उमड़ रही भीड़ से जीत-हार का होगा फैसला ? - Nai Ummid
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क्या बिहार की रैलियों में उमड़ रही भीड़ से जीत-हार का होगा फैसला ?


दीपक गोस्वामी

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और महागठबंधन के चेहरे तेजस्वी यादव की सभाओं में जुटने वाली भारी भीड़ सबका ध्यान आकर्षित कर रही है. केवल बिहार ही नहीं, तेजस्वी की भीड़ भरी सभाओं की चर्चा पूरे देश में है जिससे राज्य में सत्ता परिवर्तन की अटकलों को बल मिल रहा है.लेकिन पुराने अनुभवों की बात करें तो चुनावी सभाओं और रैलियों की भीड़ का गणित रोचक रहा है. कई मौकों पर इसने सत्ता परिवर्तन करके भी दिखाया है, तो अनेक मौके ऐसे हैं जहां यह वोट में नहीं बदली है और भीड़ जुटाने वाले नेता की बुरी हार हुई है. तो असल में तेजस्वी की सभाओं में जुटी भीड़ का मिजाज क्या है, यह जानना जरूरी हो जाता है. इसी संबंध में द वायर  ने बिहार चुनावों की जमीनी कवरेज में जुटे कुछ पत्रकारों से बात करके तेजस्वी की रैली व सभाओं में जुटने वाली भीड़ की हकीकत, उसका मिजाज और मानस जानने व समझने की कोशिश की.इस कड़ी में बिहार के चुनावी दौरे से हाल ही में लौटे दैनिक भास्कर से जुड़े राहुल कोटियाल बताते हैं, ‘तेजस्वी ने एक माहौल तो बनाया है लेकिन सोशल मीडिया पर जैसा दिखाया जा रहा है कि चुनाव तेजस्वी और राजद के पक्ष में एकतरफा हो गया है, जमीन पर हालात वैसे नहीं हैं.


वे आगे बताते हैं, ‘ऐसा इसलिए है क्योंकि भीड़ तो बाकी नेताओं की सभाओं में भी अच्छी-खासी उमड़ रही है. चिराग पासवान और असदुद्दीन औवेसी की सभाओं में बहुत भीड़ दिखती है. इसलिए सभी जगह भीड़ का होना इस दावे को खारिज करता है कि चुनाव तेजस्वी या महागठबंधन के पक्ष में एकतरफा है.’बिहार चुनावों की कवरेज में लगे स्थानीय पत्रकार विष्णु नारायण भी बताते हैं कि भीड़ सिर्फ तेजस्वी की सभाओं में ही नहीं जुट रही है. पप्पू यादव हों या चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा, सबकी सभाओं में खूब भीड़ है.विष्णु बताते हैं, ‘यह बात सही है कि बिहार में सत्ता विरोधी रुझान हैं लेकिन भीड़ को ही बदलाव का पैमाना मानेंगे तो भीड़ भी कई जगह बंट रही है. इसका मतलब वोट भी बंट रहा है. जैसे कि पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान की सभाओं में भी भारी भीड़ हो रही है. जिसे देखकर लगेगा कि यह बदलाव वाली भीड़ है और संबंधित नेता ही बदलाव का असली चेहरा है. यही तेजस्वी के मामले में है.’


बिहार के वरिष्ठ पत्रकार निराला भी कहते हैं, ‘सिर्फ चुनावी सभाओं की भीड़ के आधार पर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि बिहार की जनता का रुझान किस ओर है. इसे इस उदाहरण से समझिए कि 2015 में जब राजद और जदयू साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, तब भी भाजपा की सभाओं में भीड़ में कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह भीड़ भाजपा के लिए नतीजों में तब्दील नहीं हुई.’वे आगे कहते हैं, ‘यदि भीड़ से ही चुनावी नतीजों का अनुमान लगाएं तो लोजपा के चिराग पासवान की सभाओं में जुट रही भीड़ तेजस्वी की सभाओं की भीड़ को पार कर रही है, तो क्या मानें कि चिराग सरकार बनाने वाले हैं?’बिहार के पत्रकार उमेश कुमार राय भी जमीन पर लगातार सक्रिय हैं और उन्होंने भी कई सभाओं का कवरेज किया है.


वे बताते हैं, ‘तेजस्वी ने जिन मुद्दों को उठाया है, उनसे लोग खुद को जुड़ा पा रहे हैं. वे मुद्दे लोगों के ज़हन में उतर गए हैं. हर आदमी रोजगार की बात कर रहा है. यह भी बड़ी वजह है कि लोग बड़ी संख्या में तेजस्वी को सुनने जा रहे हैं.’वे अपनी बात पूरी करते हुए आगे कहते हैं, ‘लेकिन भीड़ देखकर चुनावी नतीजों का आकलन नहीं लगा सकते. उदाहरण के लिए बंगाल में वामदल अभी ऐसे हालातों में हैं कि तीसरे-चौथे नंबर पर खिसक गए हैं, लेकिन वे कोई सभा करते हैं तो सबसे ज्यादा भीड़ उनकी सभाओं में ही दिखेगी. प्रधनामंत्री मोदी की सभाओं से भी ज्यादा भीड़ होगी, लेकिन वह वोट में नहीं बदलेगी. अब उस भीड़ को कैसे परिभाषित करेंगे?’यहां बात वामदलों की हुई, तो बता दें कि तेजस्वी और राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन में वामदल भी शामिल हैं. कैडर आधारित वामदलों के समर्थक/कार्यकर्ता काफी मुखर माने जाते हैं जो सोशल मीडिया पर नहीं, बल्कि जमीन पर आयोजित राजनीतिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.इसलिए प्रश्न उठता है कि क्या तेजस्वी की सभाओं में उमड़ रहे जनसैलाब की एक वजह महागठबंधन में वामदलों की भागदारी भी है?

उमेश कहते हैं, ‘बेशक वामदलों के साथ होने से तेजस्वी को भीड़ जुटाने में लाभ मिल रहा है. वामदलों के कैडर जमीनी आयोजनों में हमेशा सक्रियता दिखाते हैं. बिहार में तो वामदलों, खासकर भाकपा (माले) का एक समर्पित वोटबैंक भी है, जो पूरी तरह से राजद के समर्थन में है. तेजस्वी की सभाओं में जो तेजस्वी और लाल सलाम के नारे एक साथ लग रहे हैं, उसका एक ही अर्थ है कि वामदलों के कैडर और समर्थकों की भी भीड़ जुटाने में अहम भूमिका है.’निराला भी इस बात से सहमति जताते हैं, ‘भीड़ में सबसे बड़ी भूमिका भाकपा (माले) की है. भाकपा और माकपा तो बिहार में लगभग खत्म हो चुके हैं, उनकी कोई खास सक्रियता नहीं है लेकिन दलितों में माले का अच्छा जनाधार है जो कि तेजस्वी की सभाओं में दिख भी रहा है. राजद और महागठबंधन को माले एक नया आधार दे रहा है. माले का वोट महागठबंधन को ट्रांसफर भी होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है.’बिहार से स्वतंत्र पत्रकारिता करने वाले मनोज सिंह भी इससे इत्तेफाक रखते हैं.  वे कहते हैं, ‘वामदलों का भले ही किसी जिले के खास इलाकों में ही संगठन हो, लेकिन जितना भी होता है, ठोस होता है जिसकी रैलियों में मौजूदगी भी दिखती है. उदाहरण के लिए भोजपुर के इलाकों में तेजस्वी की जो सभाएं हुईं, वहां माले के उम्मीदवार लड़ रहे हैं, उधर काफी भीड़ जुटी. उसमें जरूर माले की ताकत थी. ऐसा ही दूसरी जगहों पर भी हो रहा है. इसलिए वामदलों की ताकत और स्वयं राजद का जनाधार, दोनों मिलकर बड़ा जनसमूह खड़ा कर रहे हैं.’लेकिन यह जनसमूह वोट में भी तब्दील होगा?  इस पर संशय है. बिहार में राजनीतिक और सामाजिक तौर पर सक्रिय कृष्णा मिश्रा बताते हैं, ‘जमीन पर माले की बहुत मेहनत है जो सभाओं में तेजस्वी के पक्ष में हवा बना रही है, लेकिन इस एक उदाहरण पर गौर करें कि दक्षिण बिहार में वामदलों का पूरा जमीनी संघर्ष यादवों और भूमिहारों के खिलाफ है. वहीं, राजद का कोर वोटर ही यादव है. अब यह देखना रोचक होगा कि मतदान करते वक्त दलित और यादवों के बीच कैसे समन्वय बैठेगा?’

वे आगे कहते हैं, ‘वहीं, तेजस्वी ने जब से रोजगार की बात शुरू की, तो खासकर युवा वर्ग को कुछ उम्मीद दिखी. फिर भी वोट पाने का पैमाना भीड़ नहीं हो सकती. भीड़ तो लोकसभा चुनावों के दौरान कन्हैया कुमार की रैलियों में भी थी. वह वोट में नहीं बदली. यह भीड़ भी वोट में बदलेगी इस पर इसलिए संशय है क्योंकि नीतीश सरकार में जो बुरे जमीनी हालात थे, उन्हें भुनाने के लिए विपक्ष ने वैसी मेहनत नहीं की जैसी आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी, छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और राजस्थान में सचिन पायलट ने की थी जिससे लोगों में भरोसा पनपा.’तेजस्वी की सभाओं की भीड़ के संबंध में निराला एक अन्य पक्ष और बताते हैं, ‘नब्बे के दशक के बाद यादव और मुसलमान पहली बार बहुत आक्रामक तरीके से राजद के पक्ष में गोलबंद हुए हैं. सोशल मीडिया पर अगर नीतीश का लाइव भाषण आ रहा है तो वहां कमेंट्स में पड़ती गालियों पर गौर कीजिए. गाली देने वाली ज्यादातर यादव और मुसलमानों की प्रोफाइल होगीं. इसी तरह तेजस्वी की सभाओं की भीड़ में भी उनकी संख्या का बड़ा योगदान है.’वे आगे बताते हैं, ‘इसी संदर्भ में गांव-गांव घूमकर मैंने एक बात नोटिस की कि जिस आक्रामक तरीके से यादव और मुसलमान एकजुट हो रहे हैं, राजद को एक हिस्से का उतना ही ज्यादा फायदा है लेकिन दूसरे हिस्से का नुकसान भी है. यादव और मुसलमानों की गोलबंदी नीतीश के कोर वोटर जो कि आर्थिक पिछड़ा तबका (ईडब्ल्यूएस) है, उन्हें नीतीश की ओर लौटा रहा है. इसलिए कहना मुश्किल है कि यह भीड़ क्या रंग दिखाएगी?’कृष्णा मिश्रा भी कुछ ऐसा ही बताते हैं कि एमवाय (मुस्लिम-यादव) समीकरण का वोटबैंक हर चौक-चौराहे पर आक्रामक है जिसकी तुलना में एनडीए का वोटबैंक शांत है. इतना तय है कि तेजस्वी को फायदा मिलता दिख रहा है लेकिन डेटा विश्लेषण करने पर सत्ता और विपक्ष के बीच बड़ा अंतर है.’वे आगे कहते हैं, ‘कांग्रेस-राजद का करीब 30-32 फीसदी स्थायी वोट है, तो एनडीए के पास 45-48 फीसदी. अब भाजपा की 121 सीटों पर देखें तो वहां जदयू/लोजपा की चुनौती नहीं है. उस स्थिति में इन सीटों पर भाजपा 50 प्रतिशत के ऊपर पहुंचती है. सोचने वाली बात है कि क्या तेजस्वी की सभाओं की भीड़ 15-20 फीसदी के अंतर को पाटकर सत्ता परिवर्तन कर पाएगी? इतिहास में ऐसे कम ही उदाहरण मिलते हैं जहां इतने बड़े अंतर को पाटा जा सका हो.’बहरहाल जानकारों का कहना है कि भीड़ तो उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी और अखिलेश यादव की साझा रैलियों में भी बहुत थी और लोकसभा चुनावों के दौरान सपा-बसपा गठबंधन के तहत मायावती और अखिलेश यादव की रैलियों में भी अपार जनसमूह उमड़ा था, लेकिन नतीजे सपा-बसपा और कांग्रेस के पक्ष में नहीं आए थे.इस पर मनोज सिंह कहते हैं, ‘मैंने यूपी की रैलियां भी देखी थीं, लेकिन उनमें और तेजस्वी की रैलियों में फर्क साफ दिखता है. पहला, तेजस्वी की रैलियां विधानसभा स्तर यानी अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर हैं, फिर भी इतनी भीड़ है. दूसरा, लोग बेतरतीब ढंग से छतों पर, दीवारों पर चढ़े हुए देखे जा सकते हैं. फिर जब तेजस्वी कोई सवाल पूछते हैं तो उसका उत्साह के साथ जवाब भी देते हैं. समर्थन में नारे लगाते हैं. छतों और दीवारों पर चढ़ी यह भीड़ पार्टियों द्वारा ऑर्गेनाइज्ड भीड़ तो नहीं लगती है.’वे आगे कहते हैं, ‘रोजगार के मसले पर भीड़ में युवाओं की बड़ी भागीदारी है जिन्हें इस नजरिये से नहीं देख सकते कि वे सिर्फ तेजस्वी को देखने आए हैं. तेजस्वी कोई नये नेता नहीं हैं. पिछले साल ही लोकसभा चुनावों में भी वे सक्रिय थे. इसलिए ऐसा नहीं कह सकते कि बिहार के लोगों ने उन्हें देखा नहीं हैं और देखने आ रहे हैं.’इस पर विष्णु नारायण का अलग मत है. उनके मुताबिक, ‘वर्तमान चुनाव बिहारी जनता के लिए कोविड-19 के बाद घर से बाहर निकलने का पहला बड़ा मौका है. वे निकलकर हेलीकॉप्टर भी देखते हैं, भीड़ के नजारे और शोरगुल का मजा भी लेते हैं. इसके अलावा, लॉकडाउन के बाद बड़ी तादाद में लोग बिहार लौटे हैं. घर पर खाली रहते हैं तो रैलियां देखने चले आते हैं. घर के नजदीक सभा होने पर जैसे ही वे नेता के आने का अनाउंसमेंट सुनते हैं तो बाहर निकलकर छत पर, दीवारों पर या जहां जगह मिली चढ़ जाते हैं.’वे आगे कहते हैं, ‘चीजों को लाइव देखने का रोमांच और जुनून यूपी-बिहार में आज भी बहुत है. 

तेजस्वी के अलावा अगर कोई और भी बड़ा नेता, जैसे कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भी आएंगे तो भी लोग जुटेंगे. भले ही वे दूसरे खेमे के वोटर हों. दूसरे खेमे के हैं, लेकिन काउंट तो आप भीड़ में ही करेंगे न.’विष्णु की बात को राहुल कोटियाल के इस उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है. राहुल बताते हैं, ‘मैं बिहार के कोसी बेल्ट के दौरे पर था. वहां एआईएमआईएम के असदुद्दीन औवेसी के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं. औवेसी की सभाओं में खूब भीड़ जुट रही है. औवेसी के हेलीकॉप्टर से उतरते ही उनके पीछे लोग पागलों की तरह दौड़ रहे हैं. लेकिन, बात करने पर मुस्लिम मतदाता ही बताते हैं कि हम औवेसी को वोट नहीं देंगे क्योंकि ओवैसी सिर्फ नुकसान पहुंचाने का काम करते हैं. इसलिए जरूरी है कि इस बार महागठबंधन को जिताएं.’यह अपने आप में रोचक है कि औवेसी की सभाओं की भीड़ किसी और को वोट करने की बात कह रही है. इसलिए विष्णु मानते हैं कि भीड़ अभी सबको सुन रही है. वोट तो जात-पात के आधार पर ही डालेगी.विष्णु कहते हैं, ‘पप्पू यादव और राजद का वोट लगभग समान है. जो लोग तेजस्वी की सभा में दिख रहे हैं, वही पप्पू यादव की सभा में भी दिख जाएंगे. इसलिए किसी एक की सभा की भीड़ देखकर नहीं कह सकते कि उसके पक्ष में माहौल है. अभी मतदाता सबको सुन रहा है और समझ रहा है कि कौन मजबूत है और कौन किसको हरा रहा है? कई बार तो मतदाता वोटिंग लाइन में खड़े-खड़े ही अपना मन यह देखकर बदल लेता है कि पोलिंग बूथ पर हवा किसके पक्ष में है. फिर यह भीड़ तो सभाओं की है.’इस बात पर सभी एकमत हैं कि भीड़ मतदाता का मानस बनाने और बदलने का काम करती है और इस लिहाज से तेजस्वी ने एनडीए पर बढ़त बना रखी है.निराला ने बताया, ‘मैं अभी एक सभा में मौजूद हूं. इसमें 1,000 वाहन हैं जिसमें 900 पेड हैं. पैसा देकर इन्हें इसलिए ले जाया जा रहा है ताकि जिन गांवों से गुजरें, वहां मतदाता के मानस पर यह छाप छूटे कि फलां नेता के पास बहुत भीड़ है, यही जीत रहा है. इससे मतदाता का झुकाव भी जीतने वाले की तरफ हो जाता है.’ऐसा ही अन्य जानकार भी मानते हैं. 

उमेश कहते हैं, ‘बिहार का वोटिंग पैटर्न यह है कि लोग वोट बर्बाद करना नहीं चाहते हैं और जीतने वाले को ही देना चाहते हैं और तेजस्वी की सभाओं की भीड़ आम मतदाता के मन में एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ रही है कि वे जीत रहे हैं तो उन्हीं को वोट देंगे.’राहुल कहते हैं, ‘कैडर वोट तो पार्टियों को मिलता ही है लेकिन एक वोट ऐसे मतदाताओं का भी होता जो हमेशा बीच में झूलता रहता है या कहें कि किसी एक तरफ न झुका होकर तटस्थ होता है, इसे फ्ल्कच्यूएटिंग (Fluctuating) यानी डांवाडोल हो रहा वोटर कहते हैं. यह भीड़ देखकर मूड बनाता है कि किसकी लहर है. अब नीतीश या भाजपा की राज्य में कोई लहर नहीं है कि फ्ल्कच्यूएटिंग वोटर वहां जाए. लहर तेजस्वी की भी पॉजीटिव नहीं है, जातिगत नजरिये (एमवाय समीकरण) से देखेंगे तो ही मिलेगी, लेकिन तेजस्वी ने भीड़ के जरिये एक माहौल तैयार करने की कोशिश की है जिससे फ्ल्कच्यूएटिंग वोटर पर प्रभाव छोड़ सके.’वैसे तेजस्वी की सभाओं को सत्ता परिवर्तन के संकेतों के तौर पर इसलिए भी देखा जा रहा है क्योंकि ऐसा प्रचारित हो रहा है कि भाजपा, जदयू या एनडीए की सभाओं में भीड़ नहीं है.

इस पर विष्णु कहते हैं. ‘भाजपा की सभाएं बहुत खाली नहीं हैं और न ही ऐसा है कि नीतीश की सभाओं में भीड़ नहीं आती. नीतीश का पैटर्न है कि वे छोटी-छोटी सैकड़ा-हजार लोगों की सभाएं करते हैं जो अपने तरीके से प्रभावी हैं. वहीं, नीतीश का जो वोटर बेस है वह उतना मुखर नहीं है जितना मुस्लिम यादव वोटर है. नीतीश का समर्थक सभाओं में नहीं दिखता, शांति से काम करता है.’कृष्णा भी कुछ ऐसा ही बताते हैं. वे कहते हैं, ‘मैंने पूर्व में नीतीश की ऐसी भी रैली देखी हैं जिनमें 100-200 लोग होते थे लेकिन फिर भी वे चुनाव जीते. नीतीश कभी बड़ी रैलियां करने वाले नेता नहीं रहे. इसलिए रैली/सभाओं की भीड़ के आधार पर ही तेजस्वी की जीत के लिए आश्वस्त हो जाना समझदारी नहीं है.’वे आगे कहते हैं, ‘बेरोजगार लोग जितनी मजबूती से तेजस्वी के समर्थन में खड़े हो रहे हैं, लॉ एंड ऑर्डर को लेकर उससे ज्यादा लोग सशंकित भी हैं और नीतीश के समर्थन में हैं, बस वे लोग सामने आकर कह नहीं रहे हैं.’तेजस्वी की सभाओं की भीड़ और एनडीए की खाली सभाओं की चर्चा पर निराला कहते हैं, ‘महागठबंधन या भाजपा का वोटर बहुत मुखर है जैसे भूमिहार, यादव, मुसलमान, राजपूत, ब्राह्मण, कुर्मी, कुशवाहा आदि. यह खुलकर बात करता है, रैलियों में, सोशल मीडिया पर या कहीं भी. लेकिन, ‘ईबीसी’ बिहार का सायलेंट वोटर है. यह 223 जातियों का समूह वाचाल नहीं है. यही वोटर नीतीश की ताकत है जो सोशल मीडिया या अन्य जगह पर राजनीतिक तौर पर सक्रिय नहीं दिखेगा, लेकिन वह राजनीतिक तौर पर समर्पित बहुत है.’राहुल कहते हैं कि सारी चीजें प्रस्तुतिकरण पर निर्भर करती है. वह एक उदाहरण देते हुए समझाते हैं, ‘ऐसा कहा जा रहा है कि लॉकडाउन में पलायन करने वाली जनता एनडीए के खिलाफ वोट करेगी. लेकिन, जब मैं फारबिसगंज के उस नया टोला गांव पहुंचा जहां हर परिवार से रोजगार के लिए पलायन होता है, वहां मुझे एक-दो युवाओं के सिवाय सिर्फ बूढ़े, बच्चे और महिलाएं मिले क्योंकि युवा वापस पलायन कर चुके हैं. अब पलायन का दर्द झेलने वाला वोटर जो लॉकडाउन में हजार किलोमीटर पैदल चला था, वो बिहार में मौजूद ही नहीं है तो कैसे एनडीए के खिलाफ वोट करेगा? रही उनके परिवारों की बात तो चर्चा करने पर पता चला कि वे तो अब भी मोदी का गुणगान गा रहे थे.’राहुल आगे बताते हैं, ‘वो बात अलग है कि वे स्थानीय भाजपा उम्मीदवार से नाराज थे लेकिन वहां एक शख्स ऐसा नहीं मिला जो कह दे कि हम पलायन के दर्द के चलते वोट नहीं देंगे. इसी तरह भीड़ की तस्वीर भी ऐसे प्रस्तुत की जा रही है कि मानो मामला एकतरफा हो.’वे आगे कहते हैं, ‘तेजस्वी और भाजपा की सभाओं की भीड़ में अंतर यह भी है कि तेजस्वी की सभाओं में भीड़ बिल्कुल मंच के पास खड़ी है. वे जानबूझकर अपने कार्यकर्ताओं को मंच तक तेजस्वी के करीब आने दे रहे हैं जिससे कैमरे पर एक बज क्रिएट हो. इसके उलट जब भाजपा या मोदी की सभा में मंच के पास किसी को नहीं आने देते. मंच से करीब 50 मीटर दूर तक एक कॉरिडोर बनाते हैं. जिसके आगे से लोग बैठना शुरू करते हैं. जिससे लगता है कि भीड़ कम है.’अंत में निराला कहते हैं, ‘बंगाल में ज्योति बसु के बाद जब बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भीड़ जमा करनी शुरू की तो मैं वहां चुनावी रिपोर्टिंग पर था और देखकर लगता था कि ममता बनर्जी गलत टक्कर ले रही हैं. बुद्धदेव लाखों की भीड़ जुटा रहे हैं और ये 70-80 लोगों के बीच बोल रही हैं. लेकिन, बाद में बुद्धदेव खत्म हो गए. इसी तरह जब जगन्नाथ मिश्र राजनीतिक तौर पर खत्म हुए, उससे पहले उन्होंने भी गांधी मैदान में ऐतिहासिक भीड़ जुटाई थी. इसलिए कहूंगा कि भीड़ बदलाव तो ला सकती है लेकिन बदलाव का एक तय पैमाना नहीं हो सकती.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

(यह् लेख thewirehindi.com से लिया गया है.)

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